Yadein/यादें

आ कर दिल में घर कर लेना और न जाना यादों का,
वक़्त ज़रूरत काम आता है एक ख़ज़ाना यादों का।

इन से ही मौसम बनता है ख़ूब सुहाना दिलकश भी,
नग़्में ग़ज़लें गीत सुरीले और तराना यादों का।

ख़्वाब के रस्ते ज़हनो-दिल को पहरों बेसुध कर देना,
आंसू बन कर आंख में आना फिर बह जाना यादों का।

रिश्तों के ख़ानों में बंट जाते थे सारे रंजो- ग़म,
आते जाते राहत का मरहम दे जाना यादों का।

तपते सहरा जैसा बन कर तन्हाई जब आग बने,
चांद से ठंडी ओस गिरा कर धूप चुराना यादों का।

तितली बन के ख़्वाबों ख़्वाबों रंग भरे है और कभी,
दुल्हन जैसे एक नई हो यूं शरमाना यादों का।

माज़ी बचपन घर चौबारा नुक्कड़ पुलिया शाम नदी,
सब को ज़द में ले लेता है एक निशाना यादों का।

                                    (जौनी फ़ौस्टर, अलीगढ़)

 

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