ग़ज़ल/Ghazal (चांदनी रात/Chandni Raat)

चांदनी रात हो और हम तेरा दीदार करे
करवटे लेकर ख़ुद को यूँ ही बेदार करे।

ख़फ़ा भी तुझसे हम है,ये बात और है
पर ये लब ज़िक्र तेरा ही हर बार करें।

फ़ेहरिस्त में तेरी लोग तो और भी होंगे
पर तसव्वुर हम ही तेरा बेशुमार करें।

मालूम है की तू बेवफ़ा हरगिज़ भी नही
फिर क्यूँ न तू मुझ पे दिल निसार करे।

मेरी पलको पे संजे उन हंसी ख़्वाबों का
मुंतज़िर तू भी हो और मेरा एतबार करें।

अश्क़ मेरे मुसलसल बह रहे है तो क्या
ख़ुदा मुझसे ज़्यादा तुझको बेक़रार करे।

काश मयस्सर हो मुझे वो इक दिन भी
लबो से मुहब्बत का तू ख़ुद इक़रार करे।

बक़लमखुद : डॉ शगुफ्ता नाज़

 

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2 thoughts on “ग़ज़ल/Ghazal (चांदनी रात/Chandni Raat)

  1. Dr. Shagufta Naj says:

    Very beautiful composition.

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