Ghazal/ग़ज़ल: Umeedein (उम्मीदें)

आज़माइशों के इस दौर में सब्र करना तो होगा
चराग़ उम्मीदों का लेकर कदम रखना तो होगा।

अश्क़ से नम अगर आज दीद है तो होने दो
ग़म भुलाकर ज़िंदा दिली से हँसना तो होगा।

लड़ी से टूटकर जो फूल पल में ही बिखर गए
प्यार की डोरी में फ़िर से उन्हें पिरोना तो होगा।

गर्दो-ग़ुबार की जो ख़ुश्क़ तह आईने पे जमी है
अक़्स ज़ाहिर होने के लिए उसे हटना तो होगा।

ये नाउम्मीदी की वीरानगी जो हर सू है क़ाबिज़
सूखी शाख़ को सब्ज़ पत्तो से लदना तो होगा।

मिट्टी की ये सुराही अभी मुकम्मल नही तो क्या
ढाँचे में ढलने के लिये चाक पर घूमना तो होगा।

तूफ़ान का बवंडर जो आज समंदर में हैं बरपा
कश्ती को भी लहरों से डटकर लड़ना तो होगा।

ज़रूरी तो नही की मंज़िल आसानी से मिल जाएं
रोशन होने के लिए इस तीरगी को मिटना तो होगा।

ज़माने में जाने क्यूँ ये अजीब सी तल्ख़ी है क़ायम
पैग़ाम-ए-मुहब्बत लेकर ‘नाज़’ आगे बढ़ना तो होगा।

डॉ. शगुफ्ता नाज़
मुजफ्फरपुर, बिहार

 

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