Ghaflat/Laparwahi

न ग़फ़लत में हैं हम, ना ग़फ़लत से दूर।
हम नफ़स के ताबे, अपनी मदहोशी में चूर।

मंज़िल की आरज़ू में, काफिले में होने शरीक।
जब होश में आया तो, शहर था बहुत दूर।

ज़िन्दगी के हर मंज़र-ए-क़ायम पर दो राहें थीं।
हम मुख़्तसर की जानिब हुए, अपने असल से दूर

रफ्ता-रफ्ता तमअ की चाशनी में, खब्ती हुए हम
वक़्त गुज़रती गई, अखीर में हम थे वाहिद मजबूर।   

نہ غفلت میں ھیں ہم، نہ غفلت سے دور 
ہم نفس کے تابع اپنی مدھوشی میں چور

منزل کی آرزو میں قافلے میں ہوئے شریک
جب ہوش میں آیا تو شہر سے تھا بہت دور

زندگی کے ہر منظر قائم پر دو راہیں تھی
ہم مختصر کی جانب ہوئے اپنے اصل سے دور

رفتہ رفۃ طمع کی چاشنی میں خبتی ہوئے ہم
وقت گزرتی گئی، اخیر میں ہم تھے واحد مجبور

 

Hasnat Anwer Yazdani

 

 

Share to:

Leave a Reply