ग़ज़ल

बहर: — (बहरे हज़ज मुसम्मन महज़ूफ
अरकान : मुफाईलुन : 1222/1222/1222/122)
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चराग़ों को, मुँडेरो पे सजाया जा रहा है,
फ़िज़ा की तीरगी को, यूँ मिटाया जा रहा है।

अमन के बेशुमार फूलों से, जो हरपल लदा हो,
शजर एक ऐसा ही, मिलकर लगाया जा रहा है।

मुहब्बत की ये लौ, नफ़रत से ना कोई बुझा दे,
तलाश कर ऐसी, हर शय को हटाया जा रहा है।

कभी मायूस न होना, ज़िन्दगी के इस सफर में,
सबक़ बचपन से ही, हरदम रटाया जा रहा है।

न छोड़ा है, न छोड़ेंगे कभी उम्मीद का दामन,
क़दम इस होंसले से, अब बढ़ाया जा रहा है।

बकलम खुद
डॉ. शगुफ़्ता नाज़
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
अँग्रेज़ी विभाग, एम.डी.डी.एम. कॉलेज
बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार।

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