हे सखी! फिर से दिन वो आते/Hey Sakhi Phir Se Din Wo Aatey

*हे सखी! फिर से दिन वो आते*

हे सखी! फिर से दिन वो आते
बालिका बन हम खूब इठलाते,
मृग की भाँति कूद-कूद कर
डगर-डगर विचरण कर आते;
सभी बुलाते परन्तु हाथ न आते
पंख लगाकर फुर से उड़ जाते,
स्नेह से हाथ पकड़ एक दूजे का
फिर से खेल में मग्न हो जाते।

हे सखी! फिर से दिन वो आते…

भोर-भोर में ही प्रफुल्लित चित्त से
चुनने पुष्प उपवन में चले आते,
ओस से भीगी मख़मली घास पर
अपनी सतरंगी चुनरी फैलाते;
चुन लो चम्पा, चुन लो ये चमेली
सुरम्य हरसिंगार और श्वेत कामिनी,
पुष्पों से लदी शाखायें हिलाकर
फिर से मन भरकर खिलखिलाते।

हे सखी! फिर से दिन वो आते…

कूक से उन्मद अपने आँगन में
आम्रवृक्ष पर एक झूला लटकाते,
‘पहले मैं झुलूँगी’ बोल-बोल कर
भरी दुपहरी झगड़े में मस्त रहते;
सुधबुध अपनी सारी भुलाकर
एक दूजे को हम खूब झुलाते,
हर एक पेंग में नभ को छूकर
फिर से दिवास्वपन में खो जाते।

हे सखी! फिर से दिन वो आते…

देखते जिस क्षण घने मेघो को
प्रसन्नता से हम झूम-झूम जाते,
एक दूजे को आवाज़ लगाकर
अंगना मे सब सखियों को बुलाते;
भीग-भीग कर बरखा की बूँदों में
मिलकर सावन के मधुर गीत गाते,
मयूर की भांति नृत्य मे हो मस्त
फिर से चंचल मन को बहलाते।

हे सखी! फिर से दिन वो आते…

खुले आकाश में छत पर लेटे
घंटो-घंटो हम बतियाते रहते,
जिस क्षण दिखता टूटता तारा
नयन बंद कर कामना कर लेते;
बचपन की ही भाँति, आज भी हम
चिंता व पीड़ा से अनभिज्ञ हो जाते,
वर्तमान,भूत एवं भविष्य को भूल
फिर से काश! सुनहरे स्वपन बुन पाते

हे सखी! फिर से दिन वो आते।

✍️✍️✍️ डॉ. शगुफ़्ता नाज़

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