मुहब्बत

मुददते यूं ही बीत गई और ग़म के ये फसाने नही गए,
जो भी हो, तेरे और मेरे दरमिया कभी याराने नही गए।

रात हो या दिन मुसलसल यही सोचती रही हूं मैं,
क्यूं अब तक टूट मेरी मुश्किलों के ये पैमाने नही गए।

बैठ जाती हूं अक्सर छोड़के सभी उम्मीद के दामन,
फिर भी कभी दूर, मेरे जुस्तुजू के आशियाने नही गए।

उलझनो से लड़ के भी हमेशा कदम बढ़ाती रही हूं मै,
भले ही सर्द हो या गर्म, दिल से वो अफ़साने नही गए।

कभी झूमके कभी डूबके बढ़ती है लहरों पे नाव भी,
लाख जले पर ख्वाहिशों के चराग से परवाने नही गए।

गुलाब की इक कली है, कभी तो खिलकर महकेगी,
इसी उम्मीद से इन आंखों से खुशनुमा वो ज़माने नही गए।

लाख रास्ते में हो पत्थर, कभी पीछे नहीं है हटना तुझे नाज़
यूं तंग हाल में भी, मेरे लबों से रहनुमाई के तराने नही गए।

बकलम खुद
डॉ. शगुफ़्ता नाज़
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
अँग्रेज़ी विभाग, एम.डी.डी.एम. कॉलिज
बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार।

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