कविता-भारत की पहचान है हिंदी

ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है हिंदी।
अनेकताओं में भी, एकता की पहचान है हिंदी।
यह ज़ुबाँ जैसे, शान्ति और सद्भावना की ज़ुबाँ लगती है।
ऐसी मधुर है कि, संगीत और आराधना की जुबां लगती है।
इस जुबां को मज़हब की दीवारों में ना बांटों लोगो ।
यह जुबां वह है, जो भाई चारा भी सीखा देती है।
इसलिए तो हमारे राष्ट्र का, सम्मान है हिंदी।
ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है हिंदी।
अनेकताओं में भी, एकता की पहचान है हिंदी।

यह जुबां वह है, जो मठों में रही, स्वाभिमान के साथ।
अपने भारत को, गुलामी से छुड़ाया, आह्वान के साथ।
हिंदी दिल की धड़कन है, अर्पण भी यही, दर्पण भी यही।
लगों ने भी, दिलों में बसाया इसे, अति सम्मान के साथ।
भारत की विशेषताओं का गुणगाण है, हिंदी।
ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है, हिंदी।
अनेकताओं में भी, एकता की पहचान है, हिंदी।

लोग कहते हैं, देश में यह किस जुबां का बोलबाला है।
ऐसा लगता है, इसका अंदाज़ ही सबसे निराला है ।
जिसने भी इसे अपनाया, उनके जीवन में उजाला है।
देश के लिए, प्रेमचंद का वरदान है हिंदी।
ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है हिंदी।
अनेकताओं में भी, एकता की पहचान है हिंदी।

इसमें माँ की ममता भी है, और परियों की, कहानी भी।
इसमें गीता भी है, और क़ुरआन की, उल्लेख सुहानी भी।
इसमें देश की संस्कृति भी है, और उसकी परिभाषा भी।
रेनू और पंत ने अपने साहित्य से, इसे तराशा भी।
देश की संस्कृति का, व्याख्यान है हिंदी।
ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है हिंदी।
अनेकताओं में भी, एकता की पहचान है हिंदी।

यह तो है प्रेम की, पूजा की, और इबादत की जुबां।
देश पे जो मर मिटा, यह है, उसकी शहादत की जुबां।
पहुंचे संसद तो, देश के लिए अमन बन जाए।
पहुंचे मंदिर तो मीरा का भजन बन जाए।
दुश्मनो के लिए सरहदों पे यह दमन बन जाए।
पहुंचे महफ़िल में तो, पुष्पों का चमन बन जाए।
इस लिए देश में सदैव, विराजमान है हिंदी।
ना मिटी थी, ना मिटेगी, हमारी शान है हिंदी।
अनेकताओं में भी एकता की पहचान है हिंदी। 

✍️✍️✍️ डॉ. एजाज़ अनवर नूरी

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