बेवफाई /Bewafai/Disloyalty

ख़ुदग़र्ज़ सा ये ज़मा जो आज मुझसे है ख़फा,
मेरा भी दरिया-ए-अश्क हो गया है खुश्क सा।

नूरे-ए-चश्म में मेरी था जो हर पल बसा,
मेरा वो अज़ीज़ भी हो गया है बदगुमा।

फरेबी ख्वाहिशों को जिसने दबाया हर दफा,
उस एहसास-ए-जुनून से भी अब नहीं है राब्ता।

वो दरो दीवार जिनमें गूंजती थी दास्तानें खुशनुमा,
अजीबोगरीब रंजो गम में जाने क्यूं है मुबतला

मंडराता था शजर शजर जो आज़ाद परिंदा,
रूहासा है देखकर अपने घोंसले को लापता।

तल्खियों के गुबार में भी ना खोएगी अपनी सदा,
रंजिश-ए-ज़ंजीर तोड़कर ‘नाज़’ बढ़ेगी वाबस्ता।
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*शगुफ्ता नाज़*

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