बालू के कण

नित-निरन्तर बहती शीतल जलधारा
निहित जिसमे है कण-कण की आभा।

चमचमाते तट पर धारा के ये कण
सदैव बिखेरते है एक छटा अनुपम,
मानो कण रूपी मनोरम आभूषण से
सुसज्जित हो मर्दुल गंगा का तन।

दृष्टिगत व मनोहर ये श्वेत चन्द्रप्रभ कण
मनुष्य के आश्रय का भी है मूलाधार,
इन कणो की दृढ़ता और एकतत्वता ही
भव्य भवनो को देती है प्रबल आधार ।

एकत्रित कणो से उत्पन्न ये प्रबलता
क्या नही देती हमको भी ये विश्वास?
एकजुट होकर हम भी कर सकते है
अपने लक्ष्य और स्वपन को साकार।

आत्मविश्वास से परिपूर्ण ये मनोभाव
अंत: हर लेंगे चित्त का समस्त अन्धकार
और नकारात्मक क्षणों से संघर्ष कर,
हमको देंगे आगे बढ़ने का अटूट विश्वास।

डॉ शगुफ़्ता नाज़
(अस्सिस्टेंट प्रोफेसर)
अंग्रेजी विभाग
एम डी डी एम कॉलिज,
बी आर अम्बेडकर, बिहार यूनिवर्सिटी
मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार।

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