किसानों का दुःख

कभी मौसम की मार झेला, तो कभी पूँजी अपनी, सारी लुटाई,
किसानो की भी हो दोगुनी आय, और हो उसकी पर्याप्त कमाई।
साल भर मेहनत करके उगाता है सबके लिए दाना,
ऐसी कमाई क्या जो बिकता है बाहर रुपया सिर्फ चार आना।
अगर ना हो किसान तो खेतों में फसल कौन उगायेगा,
फिर सोचो कैसे बिना किसान के देश महान कहलायेगा।

कैसे बयान करूं मैं, किसान के दर्द और दुराचार को,
जहाँ पर वह, अपने वास्तविक मूल्य से भी लाचार हो।
सत्तर-सालों से, देश के हर गलियों और चौबारों में,
सिर्फ चर्चा किसानो की ही होती है, हर समाचारों में।

किसान तो अन्न-दाता है, वह फिर भी फसल उगायेगा,
मेहनत करके लाज़िम है, उम्मीदों का द्वीप जलाएगा।
‘ख्याली’ ने तो कह दी मन की बात, कृषि है प्रकृति का गहना,
कृषि संस्थान के अनुयायी हैं हम, सीखा है कृषि से प्यार करना।
जलवायु परिवर्तन से, किसानो की मुश्किलें हो सकती है आसान,
जब किसान, वैज्ञानिकऔर सरकार, काम करेंगे मिलकर एक सामान।

कवि: ख्याली राम चौधरी
(सहायक मुख्य तकनीकी अधिकारी)
भा.कृ.अनु.प.– राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवम्
नीति अनुसंधान संस्थान (NIAP), पूसा, नई दिल्ली-12

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