कविता : औरत और बलिदान

जलती है, पिघलती है पर घर को रोशन करती है,
मोमबत्ती के मानिंद औरत भी अँधेरे से लड़ती है।

चमन को गुलों की दिलकश महक से तो भरती है,
खिलने से पहले नाज़ुक कलियाँ,अंधेरे में घुटती है।

माना कि बेइंतहा खूबसूरत लगते है सुर्ख़ रचे हाथ,
बड़ी बेदर्दी से मेहँदी पहले सिल बट्टे पे पिसती है।

हर इक वरक़ पे लिख देती है जो हज़ारो दास्तान,
वो नायाब क़लम भी बार-बार स्याही में डूबती है।

ज़र्रे-ज़र्रे को मुनव्वर करता है जो रोज़ अपने नूर से,
रातभर तरसकर ही आफ़ताब को सहर मिलती है।

ख़िल जाता है घर का कोना-कोना उसकी आमद से,
फिर क्यूँ बेटी की पैदाइश से चेहरे की रंगत उड़ती है।

ज़माने से डरके कभी पीछे नही हटना है तुझे ‘नाज़’
क्यूंकि मंज़िल की राह पे बेटियां हौंसले से बढ़ती हैं।

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✍️✍️✍️ शगुफ़्ता नाज़

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