इंतेखाब

दर्द भी शदीद है और ज़ख़्म बहुत गहरा है
कराहटों पर हमारी हुकूमत का पहरा है।

एक तरफ़ ग़म ये कि अपनों को खोया है
हाकिम ए वक़्त तो गहरी नींद में सोया है।

चुभे हैं अगर कांटे तो अब क्यों तू रोया है
आख़िर यह बबूल तूने ख़ुद ही तो बोया है।

मगर सुन सब्र कर ले और होश से काम ले
दर्द में मुस्कुरा दे उम्मीद का दामन थाम ले।

अनक़रीब वो वक़्त भी तो आने ही वाला है
होगा मंगता तेरा जो तुझको रुलाने वाला है।

उस वक्त बदला तेरा बस सही इंतेख़ाब होगा
ज़ालिम की शिकस्त होगी तू कामयाब होगा।

निज़ाम “रोहिला”

डॉ. निज़ाम खान
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
शफी डिग्री कॉलेज, बिसालपुर,
पीलीभीत, उत्तर प्रदेश

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