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तेरे बगैर कहीं पर गुज़र नहीं

तेरे बगैर कहीं पर गुजर नही होता,
अकेली राह में हमसे सफ़र नही होता!!

सुनाते तब ही उसे हम भी अपने बारे में,+++

राष्ट्रीय वीररस कवि
संजय शुक्ला, कोटा राजस्थान, 9001098529 … Continue readingतेरे बगैर कहीं पर गुज़र नहीं

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इंतेखाब

दर्द भी शदीद है और ज़ख़्म बहुत गहरा है
कराहटों पर हमारी हुकूमत का पहरा है।………………………………………………….
हाकिम ए वक़्त तो गहरी नींद में सोया है।

डॉ. निज़ाम खान
(असिस्टेंट प्रोफेसर) … Continue readingइंतेखाब

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ग़ज़ल

चराग़ों को, मुँडेरो पे सजाया जा रहा है,
फ़िज़ा की तीरगी को, यूँ मिटाया जा रहा है।…………………………………………………….

बकलम खुद
डॉ. शगुफ़्ता नाज़
(असिस्टेंट प्रोफेसर)
अँग्रेज़ी विभाग, एम.डी.डी.एम. कॉलेज
बी.आर.अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार। … Continue readingग़ज़ल

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किसानों का दुःख

कभी मौसम की मार झेला, तो कभी पूँजी अपनी सारी लुटाई,
किसानो की भी हो दोगुनी आय, और हो उसकी पर्याप्त कमाई।

कवि: श्री ख्याली राम चौधरी
(सहायक मुख्य तकनीकी अधिकारी)
भा.कृ.अनु.प.– राष्ट्रीय कृषि आर्थिकी एवम्
नीति अनुसंधान संस्थान (NIAP), पूसा, नई दिल्ली-12 … Continue readingकिसानों का दुःख

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जियो तू साल हज़ार

ओ मेरे लाल, तू जिओ साल हजार।
जाए तेरा दिन सुभ और रात भी हो बागो बहार।

बेशक तुम्हारी हर ख्वाहिश हो पूरी और तुझे विजय पर जय मिले हर बार।
जियो मेरे दोस्त तू साल हजार। … Continue readingजियो तू साल हज़ार

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हे सखी! फिर से दिन वो आते/Hey Sakhi Phir Se Din Wo Aatey

*हे सखी! फिर से दिन वो आते* हे सखी! फिर से दिन वो आते बालिका बन हम खूब इठलाते, मृग

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